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Tuesday, May 24, 2016

रविकर का प्रणाम ; चर्चा मंच 2352



नीरज गोस्वामी 


Priti Surana 


lokendra singh 


नीरज जाट 

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 


रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 


Monday, May 23, 2016

(चर्चा अंक-2351)

मित्रों
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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गरमी का मौसम आया है!
लीची के गुच्छे लाया है!!
IMG_1177 
दोनों ने गुच्छे लहराए!
लीची के गुच्छे मन भाए!!
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एक मित्र की अंतिम संस्कार में भाग लेने हेतु मुझे उसके गाँव, अमीरपुर जाना पडा. हम दोनों एक साथ सेना में थे. सन इकहत्तर की लड़ाई में हम दोनों ने ही भाग लिया था. उस युद्ध में वह बुरी तरह घायल हो गया था. उसकी दोनों टांगें काटनी पडीं थीं. सेना से उसे सेवानिवृत्त कर दिया गया. अमीरपुर गाँव में उसकी पुश्तैनी ज़मीन थी. वह अपने गाँव चला आया. पर साधारण खेती करने के बजाय उसने बीज पैदा करने का काम शुरू किया... 
आपका ब्लॉग पर i b arora 
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मेरे जाने के बाद 

बावरा मन पर सु-मन 
(Suman Kapoor) 
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नीति की बातें 

क्रोध काम मद लोभ सब, हैं जी के जंजाल 
इनके चंगुल जो फँसा, पड़ा काल के गाल... 
Sudhinama पर sadhana vaid 
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ये सवेरा रहे 

जो है तेरा वो तेरा रहे ,ये सवेरा रहे 
शायद ,जब तक इस जिंदगी का फेरा रहे... 
कविता-एक कोशिश पर नीलांश 
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अलंकार 

अलंकार और उसके भेद के लिए चित्र परिणाम
बिना अलंकार श्रंगार अधूरा
बिना उसके साहित्य भी सूना
निखार रूप  में
तभी आता जब रूपसी
 सजी हो  अलंकारों से... 
Akanksha पर Asha Saxena 
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इक जैसा होना जरुरी नही है.....!!! 

कहाँ मिलती थी हमारी सोच,  
हमारे ख्याल, 
कुछ भी तो, एक जैसा नही था हमारे बीच....  
फिर भी ना जाने क्या था हमारे बीच,  
जो हमे जोड़ता था....  
जो इक-दूसरे के करीब रखता लाता था... 
'आहुति' पर Sushma Verma 
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तुमसे मैंने हवा ही हवा पाया 

प्रभात 
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जादूगर अनि,  

जन्मदिन मुबारक! 

Pratibha Katiyar 
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बाद गिरने के संभलना आए 

टूट कर बिखरा तो वजूद क्या  
टूट कर संवरना आए - 
गिरे पेड़ से भी कल्ले निकलते हैं  
बाद गिरने के संभलना आए... 
udaya veer singh 
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कौन 

वे चुप हैं जिनसे उम्मीद थी ख़िलाफ़त की, 
कहीं और चलते हैं, यहाँ अब बचाएगा कौन ? 
पहचाना सा लगता है मुझे हर एक चेहरा, 
कौन यहाँ दोस्त है, दुश्मन है कौन... 
कविताएँ पर Onkar 
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उन्ही राहों पर हम तन्हा चले हैं

कदम के निशाँ तेरे मेरे पड़े हैं ॥

वही रंग हैं और वही रूप भी है

मगर मेड नज़रें झुकाए खड़े है... 

Sunday, May 22, 2016

"गौतम बुद्ध का मध्यम मार्ग" (चर्चा अंक-2350)

मित्रों
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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नारद जयंती पर आह्वान गीत 

संवादी ऋषि तत्वज्ञानी, तुम पराध्वनी के विज्ञानी
हे नारद आना इस युग में, युग भूल रहा अन्तसवाणी
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सत्य सनातन घायल है, धर्म ध्वजा खतरे में है
मानवतावादी चिंतन भी, बंदी है ! पहरे में है..!
मुदितामय कैसे हों जीवन ? हैं ज्ञान-स्रोत ही अभिमानी !!...  
मिसफिट Misfit पर गिरीश बिल्लोरे मुकुल 
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अप्प दीपो भव 

Kailash Sharma 
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नज़रों का धोखा था वो, सादिक वफा नहीं थी, 

सिद्दत से उसको ढूँढा, भटका हूँ हर जगह पर,  
लेकिन न वो मिला, मुझे जिसकी तलाश है। 
चल-चल के रहगुजर में, जूते घिसे और पैर भी, 
मंजिल के अब तलक हम, फिर भी न पास है... 
अभिव्यक्ति मेरी पर मनीष प्रताप  
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चन्द माहिया : 

क़िस्त 33 

:1: 
जब तुम ने नहीं माना 
टूटे रिश्तों को 
फिर क्या ढोते जाना 
:2: 
मुझ को न गवारा है 
ख़ामोशी तेरी 
आ, दिल ने पुकारा है 
:3:.. 
आपका ब्लॉग पर आनन्द पाठक 
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पहला और दूसरा 

पहला शांत है पर चेतन, जागृत 
दूसरा अशांत है उद्वेलित 
कोशिश कर रहा दूसरा 
पहले को परेशान करने की... 
मन का पंछी पर शिवनाथ कुमार 
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मुक्त-ग़ज़ल : 189 -  

उन्ही का ख़्वाब रहे ॥ 

हम पे प्यासों में भी न क़तरा भर भी आब रहे ॥ 
उन पे नश्शे में भी सुराही भर शराब रहे ॥ 
रोशनी को चिराग़ भी नहीं रहे हम पे , 
उनकी मुट्ठी में क़ैद सुर्ख़ आफ़्ताब रहे... 
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प्रधानमंत्री मोदी जी के नाम पत्र 

परमप्रिय/आदरणीय प्रधानमंत्री जी, . आपके कार्यकाल के दो वर्ष पूरे होने पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं बधाई । आप स्वस्थ एवं दीर्घायु हों तथा अपनी जनता की सेवा इसी प्रकार करते रहें । आपका बहुत-बहुत आभार की आप हमारे द्वारा लिखी गयी पोस्टों पर निरंतर अपनी पैनी दृष्टि बनाये रखते हैं और उन्हें संज्ञान में भी लेते हैं । पिछले दो वर्षों में मैंने आपसे जिन मुद्दों पर भी निवेदन किया आपने उन्हें तत्काल संज्ञान में लेकर उन्हें समय रहते दुरुस्त भी किया है । कुछ बहुत अहम् मुद्दों पर जहाँ आपसे चूक हो रही थी , उन्हें भी आपने हमारी पोस्टों द्वारा निवेदन किये जाने का सम्मान करते हुए सुधारा । हमारा एक निवेदन... 
ZEAL 
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बाल कविता 

"खरबूजों का मौसम आया" 

(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

मित्रों...!
गर्मी अपने पूरे यौवन पर है।
ऐसे में मेरी यह बालरचना 
आपको जरूर सुकून देगी!


लो मैं पेटी में भर लाया!
खरबूजों का मौसम आया!!

rcmelon
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देती दुहाई सूखी धरा 

देती दुहाई सूखी धरा करती रही पुकार 
आसमाँ पर सूरज फिर भी रहा बरसाता अँगार... 
Ocean of Bliss पर Rekha Joshi  
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मैं प्रकृति हूँ !! *********** 

Mera avyakta पर 
राम किशोर उपाध्याय 
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दो मुक्तक  

"आहुति देते परवाने हैं" 

(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

हम दधिचि के वंशज हैं, ऋषियों की हम सन्ताने हैं।
मातृभूमि की शम्मा पर, आहुति देते परवाने हैं।
दुनियावालों भूल न करना, कायर हमें समझने की-
उग्रवाद-आतंकवाद से, डरते नहीं दीवाने हैं।
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इश्क़ की केतली में  
पानी-सी औरत और  
चाय पत्ती-सा मर्द  
जब साथ-साथ उबलते हैं 
चाय की सूरत  
चाय की सीरत  
नसों में नशा-सा पसरता है  
पानी-सी औरत का रूप  
बदल जाता है...  
लम्हों का सफ़र पर डॉ. जेन्नी शबनम 
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बुद्ध का धर्म चक्र प्रवर्तन 
बहुतेरे लोग मानते हैं कि गौतम बुद्ध ने कोई नया धर्म चलाया था और वे हिंदू धर्म से अलग हो गए थे। हालांकि ऐसे लोग कभी नहीं बता पाते कि बुद्ध कब हिंदू धर्म से अलग हुए? हाल में एक वाद-विवाद में बेल्जियम के विद्वान डॉ. कोएनराड एल्स्ट ने चुनौती दी कि वे बुद्ध धर्म को हिंदू धर्म से अलग करके दिखाएं। एल्स्ट तुलनात्मक धर्म-दर्शन के प्रसिद्ध ज्ञाता हैं। ऐसे सवालों पर वामपंथी लेखकों की पहली प्रतिक्रिया होती है कि ‘दरअसल तब हिंदू धर्म जैसी कोई चीज थी ही नहीं।’ यह विचित्र तर्क है... 
हिन्दू - हिंदी - हिन्दुस्थान 
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