चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

समर्थक

Friday, July 21, 2017

"जब-जब ये सावन आता है" चर्चा - 2673

आज की चर्चा में आपका हार्दिक स्वागत है 
 उच्चारण
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काजल 

मस्त रहो अपनी भक्ति की चरस में

यादें कभी नहीं मिटती

सीतावनी मंदिर व जंगल सफारी

धर्म की दीमकें

फरीदा काहलो की डायरी का एक पन्ना
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मनमीत 

Akanksha पर Asha Saxena 
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सजदा हवा करे, मौसम नमाज हो... 

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ओ गुड़िया! 

kuldeep thakur  
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हिंदी की सर्वकालीन श्रेष्ठ कहानियों में एक 

अमरकांत की कहानी : 

दोपहर का भोजन 

सरोकार पर Arun Roy  
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जब-जब ये सावन आता है ! 

Sawan Ki Shayari 

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कुछ लोग, 

कुछ लोग कहते हैं... 

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी  
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क्या आपने कभी 

इन पश्चिमी दार्शनिकों को पढ़ा है 

मेरी धरोहर पर yashoda Agrawal  
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Thursday, July 20, 2017

''क्या शब्द खो रहे अपनी धार'' (चर्चा अंक 2672)

मित्रों!
गुरूवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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विविध दोहे ' 

'सीधी-सच्ची बात''  

भारत माता के लिएहुए पुत्र बलिदान।
ऐसे बेटों पर सदामाता को अभिमान।१।

दिल से जो है निकलतीवो ही करे कमाल।
बेमन से लिक्खी हुईकविता बने बबाल।२।

राजनीति के खेल मेंकुटिल चला जो चाल।
उसकी जय-जयकार हैउसका ही सब माल।३।... 
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मै गलत नही 

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी 
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ये तोपें हिन्द की गर खुल गईं दुश्मन का क्या होगा, 

मिटेगा हर निशाँ दुनियाँ के नक्शे से बयाँ होगा... 
Harash Mahajan 
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----- || दोहा-एकादश || ----- 

धरम अनादर मति करो होत होत जहाँ अवसान | 
ताहि कंधे पौढ़त सो पहुँचे रे समसान || १ ||...
NEET-NEET पर Neetu Singhal 
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749 

दूर जाते हुए
                       डा कविता भट्ट

दूर जाते हुए मन सीपी-सा उसकी यादों के समंदर में खोया था
जिसके सीने को मैंने कई बार अपने आँसुओं से भिगोया था

खोज रही थी आने वाले हर चेहरे में उसका निश्छल चेहरा
भोली आँखें- जिनकी नमी वो ज़माने से छिपाता ही रहा
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बरसो रे ! 

अर्चना चावजी Archana Chaoji 
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ललिता का बेटा 

बिना किसी अपेक्षा के, अपनी अंतरात्मा की आवाज पर, निस्वार्थ भाव से किसी के लिए किया गया कोई भी कर्म जिंदगी भर संतोष प्रदान करता रहता है। यह रचना काल्पनिक नहीं बल्कि सत्य पर आधारित है। श्रीमती जी शिक्षिका रह चुकी हैं। उनका एक अनुभव उन्हीं के शब्दों में .... 
कुछ अलग सा पर गगन शर्मा 
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रेप----- 

अंजली अग्रवाल 

आज मुझे एक बार फिर 
आदरणीय अंजली अग्रवाल जी की 
ये कविता याद आ गयी.... 
कविता मंच पर kuldeep thakur 
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थोड़ा रोमांच भर लायें..... 

निधि सक्सेना 

बहुत कड़वा हो गया है जिंदगी का स्वाद 
चलो किसी खूबसूरत वादी से 
थोड़ा रोमांच भर लायें.. 
मेरी धरोहर पर yashoda Agrawal 
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सेफू! तू भी अपनी माँ की बदौलत है 

 उत्तर भारतीय शादी में और इस कार्यक्रम में कुछ अन्तर नहीं था। हमारे यहाँ की शादी कैसी होती है? शादी का मुख्य बिन्दु है पाणिग्रहण संस्कार। लेकिन यह सबसे अधिक गौण बन गया है, सारे नाच-कूद हो जाते हैं उसके बाद समय मिलने पर या चुपके से यह संस्कार भी करा दिया जाता है। जितने भी फिल्मों के अवार्ड फंक्शन होते हैं, उनमें भी यही होता है। अवार्ड के लिये एक मिनट और हँसी-ठिठोली के लिये दस मिनट। शादी में सप्तपदी से अधिक महिला संगीत पर फोकस रहता है, यहाँ भी कलाकारों के नृत्य पर ध्यान लगा रहता है। आप किसी भी शादी में मेहमान बनकर जाइए, बस वहाँ सब...  

Wednesday, July 19, 2017

"ब्लॉगरों की खबरें" (चर्चा अंक 2671)

मित्रों!
बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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क्यों लड़ते हैं लोग घरों में ? 

उसके घर का आने -जाने का रास्ता घर के पिछले हिस्से से होकर है ,मेरे और उसके ,दोनों घर के बीच में सामान्य अन्तर है .. बातचीत, नोक-झोंक ...सब सुनाई देता है ... कामकाजी बहू है ..... सास और बहू दोनों ताने देने में मास्टर हैं ... 
अर्चना चावजी Archana Chaoji 
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दिल न रोशन हुआ ,लौ लगी भी नही, 
फिर इबादत का ये सिलसिला किस लिए 
फिर ये चन्दन ,ये टीका,जबीं पे निशां 
और  तस्बीह  माला  लिया किस लिए ... 
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DEKHIYE EK NAJAR IDHAR BHI 
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ये तू मुझसे क्या चाहता है ! 

ये तू मुझसे क्या चाहता है ! 
दर्द देकर दवा चाहता है... 
हालात आजकल पर प्रवेश कुमार सिंह 
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मुल्कों की रीत है... 

कैसा अजब सियासी खेल है, 
होती मात न जीत है 
नफ़रत का कारोबार करना, 
हर मुल्कों की रीत है... 
लम्हों का सफ़र पर डॉ. जेन्नी शबनम 
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एक सिपाही का खुला खत 

palash "पलाश" पर डॉ. अपर्णा त्रिपाठी 
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लड़ना क्या इतना आसान होता है? 

हिन्दी_ब्लागिंग लड़ना क्या इतना आसान होता है? पिताजी जब डांटते थे तब बहुत देर तक भुनभुनाते रहते थे, दूसरों के कंधे का सहारा लेकर रो भी लेते थे लेकिन हिम्मत नहीं होती थी कि पिताजी से झगड़ा कर लें या उनसे कुछ बोल दें। माँ भी कभी ऊंच-नीच बताती थी तो भी मन मानता नहीं था, माँ को जवाब भी दे देते थे लेकिन बात-बात में झगड़ा नहीं किया जा सकता था.... 
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