समर्थक

Monday, December 05, 2016

"फकीर ही फकीर" (चर्चा अंक-2547)

मित्रों 
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

--

दोहागीत 

पाँच दिसम्बर 

वैवाहिक जीवन के तैंतालीस वर्ष पूर्ण 

मृग के जैसी चाल अब, बनी बैल की चाल।
धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल।।
--
वैवाहिक जीवन हुआ, अब तैंतालिस वर्ष।
जीवन के संग्राम में, किया बहुत संघर्ष।।
पात्र देख कर शिष्य को, ज्ञानी देता ज्ञान।
श्रम-सेवा परमार्थ से, मिलता जग में मान।।
जो है सरल सुभाव का, वो ही है खुशहाल।
धीरे-धीरे कट रहे, दिवस-महीने-साल... 
रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 
--

आज मौसम बड़ा..बेईमान है बड़ा 

प्रकृति प्रद्दत मौसमों से बचने के उपाय खोज लिये गये हैं. सर्दी में स्वेटर, कंबल, अलाव, हीटर तो गर्मी में पंखा, कूलर ,एसी, पहाड़ों की सैर. वहीं बरसात में रेन कोट और छतरी. सब सक्षमताओं का कमाल है कि आप कितना बच पाते हैं और मात्र बचना ही नहीं, सक्षमतायें तो इन मौसमों का आनन्द दिलवा देती है. अमीर एवं सक्षम इसी आनन्द को उठाते उठाते कभी कभी सर्दी खा भी जाये या चन्द बारिश की बूँदों में भीग भी जायें, तो भी यह सब सक्षमताओं के चलते क्षणिक ही होता है. .. 
--

हर तरफ फकीर हैं 

फकीर ही फकीर 

उलूक टाइम्स पर सुशील कुमार जोशी 
--

दौड़ते रहें, 

स्वस्थ्य रहें, 

सुखी रहें 

कल Neeraj Jat के फेसबुक स्टेटस पर आदरणीय Satish Saxena जी ने बताया था कि कैसे दौड़ना शुरू करना है, वॉक रन वॉक रन और कौन कौन से दिन करना है, शनिवार या रविवार को 8 किमी या उससे अधिक करना सुझाया था, कल बरसात भी थी, ठंड भी थी, और रजाई भी थी... 
कल्पतरु पर Vivek 
--

लेखकीय संतुलन 

जब कभी लगता है कि लेखन में आनन्द नहीं आ रहा है तो लेखन कम हो जाता है। लेखन अपने आप में एक स्वयंसिद्ध प्रक्रिया नहीं है। इसके कई कारक और प्रभाव होते हैं। क्यों लिखा जाये, कैसे लिखा जाये और क्या लिखा जाये, ये मूल प्रश्न आठ वर्ष के ब्लॉग लेखन के बाद आज भी निर्लज्ज प्रस्तुत हो जाते हैं। लेखन के प्रभाव बिन्दु पठन के कारक होते हैं। क्यों पढ़ा जाये, क्या पढ़ा जाये, इस पर निर्भर करता है कि 
क्या लिखा जाये... 
Praveen Pandey  
--
--

आज जो ये रविवार है  

सोचता हूँ..... बहुत हौले हौले बीते

आज जो ये रविवार है .......

आज जो ये रविवार है .......


मुआँ ज़ल्द बीता जाने की

मुआँ ज़ल्द बीता जाने की


कसम खाके आया ...... ओह लो
उतरने भी लगा
कसम खाके आया ...... ओह लो

उतरने भी लगा


हमसे ज़्यादा जल्दी क्यों है इसे...

गिरीश बिल्लोरे मुकुल 
--
--

नाक कटवाना -  

स्वर्ग मिलेगा 

पीएम ने रैली में पूछा कि गरीबों के हक के लिए लड़ना क्या गुनाह है? मैं आपके लिए लड़ रहा हूं। मेरा क्या कर लेंगे ये लोग? मैं फकीर हूं, झोला लेकर निकल लूंगा। अगर गरीब के हाथ में ताकत आ जाए तो गरीबी कल खत्म हो जाएगी। इरादे नेक हैं, तो देश कुछ भी सहने को तैयार को जाता है, ये मैंने महसूस किया है। आज सवा सौ करोड़ के देश ने जिम्मेदारी को अपने कंधे पर ले लिया है। देश भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहता है।
             दस लाख रुपये का सूट पहनने वाला सत्तर करोड़ रुपये के काजू खाने वाला किस तरह से अपने मुंह से अपने को फ़कीर घोषित कर रहा है... 
Randhir Singh Suman  
--

बेटी ही बेटा है.. 

शबनम शर्मा 

छुट्टियों के बाद स्कूल में मेरा पहला दिन था। नीना को सामने से आता देख मुझे अचम्भा सा हुआ। वह स्कूल की पी.टी. अध्यापिका है। पूरा दिन चुस्त-दुरुस्त, मुस्काती, दहाड़ती, हल्के-हल्के कदमों से दौड़ती वह कभी भी स्कूल में देखी जा सकती है। आज वह, वो नीना नहीं कुछ बदली सी थी। उसने अपने सिर के सारे बाल मुंडवा दिये थे। काली शर्ट व पैंट पहने कुछ उदास-सी लग रही थी... 
yashoda Agrawal  
--

694 

--

थोड़ी चिंता खाद की भी कीजिए 

अपने देश की खेती-बाड़ी में जो बढ़ोत्तरी हुई है, जो हरित क्रांति हुई है उसमें बड़ा योगदान रासायनिक उर्वरकों का है। हम लाख कहें कि हमें अपने खेतों में रासायनकि खाद कम डालने चाहिए-क्योंकि इसके दुष्परिणाम हमें मिलने लगे हैं—फिर भी, पिछले पचास साल में हमारी उत्पादकता को बढ़ाने में इनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा है। लेकिन, अभी भी प्रमुख फसलों के प्रति हेक्टेयर उपज में हम अपने पड़ोसियों से काफी पीछे हैं... 
Manjit Thakur 
--

सर्दी की चिठ्ठिया.... 

काँपती उँगलियों से,  
थरथराते शब्दो को लिख रही हूँ....  
धुंध में तुम्हे ढूंढती 
अपनी आँखों की बेचैनियां, 
इस बार राजाई में छुप कर, 
तुम्हारी पढूंगी,और तुम्हे लिखूंगी, 
मैं भी तुम्हे सर्दी की चिठ्ठियां... 
Sushma Verma  
--

नोटबंदी की मुश्किल 

और मोदी सरकार के खिलाफ खड़ी 

बड़ी आफत की पड़ताल 

8 नवंबर को 8 बजे जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को अब तक के सबसे बड़े फैसले की जानकारी दी, तो देश के हर हिस्से में हाहाकार मच गया। देश में काला धन रखने वालों, रिश्वतखोरों के लिए ये भूकंप आने जैसा था। *दृष्य 2-* दिल्ली के चांदनी चौक, करोलबाग इलाके में गहनों की दुकान पर रात आठ बजे आए भूकंप का असर अगली सुबह तक दिखता रहा। नोटों को बोरों में और बिस्तर के नीचे दबाकर रखकर सोने वालों की बड़ी-बड़ी कारें जल्दी से जल्दी सोना खरीदकर अपना पुराना काला धन पीले सोने की शक्ल में सफेद कर लेना चाहती थीं। और ये सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, देश के लगभग हर शहर में हुआ... 
HARSHVARDHAN TRIPATHI 
--

छोटी मछली 

बड़ी छोटी मछली अब मछलियां बगुले के झांसे में नहीं आने वाली थी। वह उसकी जात पहचान गई थी। ‘हूँ! खड़ा है आंख बंद किये एक टांग पर खड़ा रह बच्चू तू क्या, समझता है कि हम झांसे में आ जायेंगे... 
Shashi Goyal पर 
shashi goyal  

Sunday, December 04, 2016

"ये भी मुमकिन है वक़्त करवट बदले" (चर्चा अंक-2546)

मित्रों 
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

--
लहरों, 
बहुत हो गया खेल-कूद, 
बहुत हो गई मस्ती, 
बहुत घुमा दिया तुमने मुझे बीच समुद्र में, 
अब मुझे किनारे पर ले चलो. 
चाहो तो पटक दो मुझे चट्टानों के ऊपर, 
पर महसूस करने दो मुझे 
पांवों के नीचे ज़मीन के होने का सुख. 

कविताएँ पर Onkar 
--

बालगीत  

"नहीं सुहाता ठण्डा पानी" 


कुहरा करता है मनमानी।
जाड़े पर छा गयी जवानी।।
  
नभ में धुआँ-धुआँ सा छाया,
शीतलता ने असर दिखाया,
काँप रही है थर-थर काया,
हीटर-गीजर शुरू हो गये,
नहीं सुहाता ठण्डा पानी।
जाड़े पर छा गयी जवानी... 
--
--

बूझो तो जाने। .. 


सुबह सवेरे रोज जगाये 

नयी ताजगी लेकर आये 

दिन ढलते, ढलता रंग रूप 
क्या सखि साजन ?
नहीं सखि  धूप ... 
shashi purwar 

राष्ट्र प्रेम की दीप शिखा पर ..... 

शब्द अंतस के उचर रहे  
प्रतिभागी राष्ट्र प्रेम के कहाँ गए  
शीश अर्पण की वेला आई  
यश गाने वाले कहाँ गए... 
udaya veer singh 
--

इम्तहान 

अब बस भी कर ऐ ज़िंदगी ! 
और कितने इम्तहान देने होंगे मुझे ? 
मेरे सब्र का बाँध अब टूट चला है... 
Sudhinama पर 
sadhana vaid 
--

तुम और मैं -५ 

जानती हूँ तुम नहीं हो .. 
ख़ामोशी तुम तक पहुँचने का 
मेरा पसंदीदा एकमात्र विकल्प है !! 
सु-मन (Suman Kapoor) 
--

जिनमें असीर है कई 

यूँ तो कुछ नहीं बताने को.. 
चंद खामोशियाँ बचा रखे हैं 
जिनमें असीर है कई बातें 
जो नक़्श से उभरते हैं 
खामोशियों की क्या ? 
कोई कहानी नहीं... 
Pammi Singh 
--

ब्रेड की रसमलाई 

*क्या *आप भी ऐसी कोई मिठाई बनाना चाहते है, जो कम मेहनत में बने...स्वादिष्ट हो...बिना घी से बनी हो ताकि सेहत के लिए नुकसानदायक भी न हो...तो यह मिठाई स्पेशली आप ही के लिए है! यदि घर में मेहमान आने वाले हो और आपको व्यंजन पहले से बना कर रखना है तो यह मिठाई बना सकते है। तो आइए, आज हम बनाते है ब्रेड की रसमलाई... 
--

बाई पुराण 

बाई मेरे तुम्हारे बीच
बड़ा पुराना रिश्ता था
पैसे से न तोला जिसे
 बच्चे तक लगाव  रखते थे तुमसे 
शायद तब शरीर सक्षम था मेरा 
मैं तुम पर आश्रित न थी
जब भी कोई मेहमान आता
तुम अपना फर्ज निभाती थीं... 
Akanksha पर 
Asha Saxena 
--

भोपाल 

भोपाल शहर के बनने और बसने के बीच उजड़ता है बहुत कुछ कुछ मंदिर कुछ मस्जिद कुछ महल और कुछ मजारे बची रहती हैं है बार उजड़ने से पहले न मालूम सदियों पहले जिसे राजा भोज ने बसाया था कौन रहा होगा इस नगर भोपाल की भीमवेटिका की गुफाओं में और जब नवावो ने बनाये होंगे हवेलियाँ कितने ही हाथों के ज़ख्म दफन होंगी इनमे शहर तमाम दुखों के बाद भी रहता है ज़िंडा जैसे ज़िंदा है आज भोपाल उस गैस रिसाव हादसे के बाद कौन देख रहा है आज रिसते हुए औरतों को खांसते हुए आदमियों को जली हुई चमड़ी लेकर पैदा हुए बच्चों को कौन पढ़ रहा है न्यायालयों की याचिकाओं में दर्ज़ मुर्दा नामों को खड़े हैं फन उठाये... 
सरोकार पर Arun Roy 
--
--

पंखुड़ी बनते ही बिखर जाएंगे 

कल फतेह सागर झील के ऊपर कुछ पक्षी कतारबद्ध होकर उड़ रहे थे, उनका मुखिया सबसे आगे था। मुखिया को पता है कि उसे कहाँ जाना है, उसकी सीमा क्या है। किस पेड़ पर रात बितानी है और कितनी दूर जाना है। सारे ही पक्षी अपने मुखिया पर विश्वास करते हैं। सभी को पता है कि हमारी भी एक सीमा है, हम सीमा के हटकर कुछ भी करेंगे तो जीवन संकट में पड़ जाएगा। हम अपने घर में, समाज में, देश में सीमाएं या नियम इसीलिये बनाते हैं कि सब सुरक्षित रहें लेकिन कुछ लोग अपनी सीमाओं को तोड़ने का दुस्साहस करते हैं। वे स्वयं की सुरक्षा को तो ताक पर रख ही देते हैं ... 
smt. Ajit Gupta 
--

Posts of 2 Dec 2016 

उज्जवला योजना के तहत बांटे गए गैस कनेक्शन के लिए माननीय प्रधानमंत्री जी, भारत सरकार, के अनुसार गैस कंपनियां विज्ञापन सीखा रही है कि गैस चूल्हे और टंकी के इस्तेमाल में क्या क्या सावधानियां रखनी है। अच्छा विज्ञापन है बहुत बारीकी से बनाया गया है, मैंने भी सीखा इससे बहुत कुछ। बस बता रहा हूँ कि 21 वी सदी के डिजिटल इंडिया में हम कहाँ से अभी शुरुवात कर रहे है ;- शौचालय के इस्तेमाल से गैस के चूल्हे और टंकी के इस्तेमाल से जैविक खाद के इस्तेमाल से कचरा सही जगह कैसे फेंके लाईंन में खड़े कैसे हो बैंक अकाउंट खोलना और इस्तेमाल करना आधार कार्ड बनवाने से भ्र्ष्टाचार रोकना... 
Sandip Naik 
--

हँसता हुआ जो जाएगा, 

वो मुकद्दर का सिकंदर 

जान ऐ मन कहलायेगा 

सारे टी वी एंकर्स , प्रिंट मीडिया नोटबंदी को लेकर हलकान हुए जा रहे है। कहाँ कितनी लंबी लाइन लगी है? कहाँ कौन दुखी है, कौन गश खा कर गिर गया, कौन हार्ट अटेक से परलोक सिधार गया, कौन अम्मा भूखी रह गयी कौन बाबा दुःख से पगलाया हुआ है...किसका ब्याह रुक गया, नहीं रुका नहीं। किसके ब्याह में नोटबंदी से अड़चन आ गयी? या रब बेकार बातें,कबाड़ बातें। रोज़ वही मिच -मिच। रोज़ वही टॉपिक। सभी दुखियारों का इन मीडिया वालों से जबरदस्त कॉन्ट्रैक्ट है। तभी तो इनकी माइक्रस्कोपी आँखों को ये सब दिखता रहता हैं। किसी एक के मुंह में माइक लगा कर कुछ सुनवा देते हैं। फिर हमसे उम्मीद - लो जी सारे देश का नक्शा यही है... 
Sehar पर 
Ria Sharma 
--

बैंक के आगे लंबी कतारें 

और एटीएम के शटर डाऊन 

अभी एक मित्र बैंक से आ रहे हैं, बहुत लंबी लाईन थी और बैंक में एक समय में एक ही बन्दे को अन्दर जाने दे रहे थे। अंदर जाकर देखा कि 1 ही लाईन है, जमा और भुगतान दोनों की। उन्हें पुराने नोट जमा करने थे, उसमें उन्हें 2 घंटे लग गये,.. 
कल्पतरु पर Vivek 
--

कुछ तो रह जाता है ... 

पर उसके शरीर से लगे थे उसके ... 
यानि उस स्त्री के वह - 
जो चाहती थी उड़ना 
लेकिन उसे किसी ने बताया ही नहीं कि 
उसे उड़ना है वह उड़ सकती है ! 
उसे तो गुड़िया घर से उठाकर दान कर दिया गया 
शालीनता, सहनशीलता का पाठ पढ़ाया गया... 
रश्मि प्रभा.
--

बीजेपी संगठन में 

भला कोई क्यों काम करे? 

भारतीय जनता पार्टी ने लम्बे समय से इंतजार कर रही दिल्ली और बिहार इकाई को उनका नया अध्यक्ष दे दिया है। मनोज तिवारी को दिल्ली का अध्यक्ष बना दिया गया है। साथ ही बिहार इकाई का अध्यक्ष नित्यानंद राय को बना दिया गया है। उत्तर पूर्वी दिल्ली से बीजेपी सांसद मनोज तिवारी गायक हैं, भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता हैं। संगठन में कोई खास काम नहीं किया है... 
HARSHVARDHAN TRIPATHI 
--

”ये भी मुमकिन है वक़्त ले करवट …..” 

बस तबाही के ही आसार नज़र आते हैं ,  
लोग जालिम के ही तरफदार नज़र आते हैं ,  
ज़ुल्म भी हम पे ही होता है ज़माने में सदा  
और फिर हम ही गुनाहगार नज़र आते हैं ... 
! कौशल ! पर 
Shalini Kaushik  
--

टूट जाए जो मेरा दिल तो ख़ता क्या दोगे 

अश्क आए तो निगाहों को सजा क्या दोगे । 
है पता खूब वफाओं का सिला क्या दोगे।। 
खत जो आया था मुहब्बत की निशानी लेकर । 
लोग पूछें तो जमाने को बता क्या दोगे...
Naveen Mani Tripathi 
--

LinkWithin